सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ईजा - ( माँ )


ईजा को कभी थकते नही देखा ठहरा , रात को सबसे लेट सोती ओर सुबह जब उठते तो जगी हुई मिलती , पता नही सोती भी थी के नही , रात में खट की आवाज भी हो जाये तो , तुरंत जग जाने वाली ठहरी। mother

arjunbisht336
ईजा सिर्फ हमारी ही नही ठहरी , बकरी के पाठ ( बकरी का बच्चा ) भी ईजा को देखते ही दौड़ लगा के चले आते ,बाखई का भुर्री कुकुर ( भूरा कुत्ता ) भी लाड जताने चला आता  , भैंस ओर उसका थोर देखते ही अड़ाने लग जाते। 

हम ईजा से कहते भी थे , तेर (तेरे ) कज्यो ( बहुत ) नानतीन ( बच्चे ) है गी याँ ( हो गये यहाँ )।
arjunbisht336
ईजा ये सुन कर हँसने लगती ओर कहती , होय ( हाँ ) सब नानतीन (बच्चे ) तो छन (हैं ) म्यार (मेरे ) , इनोकें ( इनको )  जो दी दुलार , यो करनी उनुके ( उन्हें ) प्यार , ईजा सबकी दुलारी थी। mother

सुबह उठ कर चाय रखना , एक चूल्हे में नहाने का पानी रखना , नाश्ते के लिये पिसु ( आटा ) ओल (गूंथ ) कर रोट (रोटी ) बनाना , इतने काम एक साथ ईजा पता नही कैसे कर लेती थी। 
पूरे दिन काम में उलझी रहने वाली ईजा के चेहरे पर कभी उलझन नही देखी ठहरी हमने , हमेशा चेहरे पर मुस्कान तैरती रहती थी उनके।
arjunbisht336
बडे दा ( बडे भाई ) की छुटकी तो दूसरी ईजा बनी फिरती थी , दिन भर ईजा के साथ ही रहती , ओर उनके जैसे ही काम करने की कोशिश करती रहती।mother
ईजा एक थी पर हर किसी को उसकी डिमांड थी , अक्सर मुझे ईजा कंप्यूटर सी लगती थी , क्योंकि यंत्रवत सी होकर वो हर काम निभाती थी।

ईजा के हाथ की बनाई रोटी का स्वाद गजब होता था , चूल्हे पर हाथ पर थापी हुई रोटियाँ , तवे पर पकने के बाद जब घोव ( चूल्हे ) में सेकने डालती तो पम  फूल जाती।mother
ईजा ओर चूल्हे का रिश्ता भी अनोखा ठहरा , ईजा रोज चूल्हे की लिपाई तल्लीनता से करती ओर बदले में चूल्हा स्वादिष्ट भोजन पका देता , ऐसा लगता जैसे दोनों एक दूसरे के संगी हों , हों क्या थे ही क्योंकि दोनों दिनभर एक दूसरे के साथ दिख ही जाते।
arjunbisht336
घर की रौनक थी ईजा , मधुर धुन की झंकार थी ईजा , घर को संतुलित करने का आधार थी ईजा! mother

स्वरचित लघु कथा 
सर्वाधिकार सुरक्षित

English version 

Eaja ( Mother )

Eaja was never seen tired, got up late at night and got up when he woke up in the morning, did not even know if he was sleeping, even if there was a sound of a night in the night, he was awake immediately.

arjunbisht336
Eja was not only ours, the goat lessons (goat's child) also came running after seeing Eaja, Bachhai's Bhurri Kukur (brown dog) also used to show a lot of pampering, buffalo and started thrashing on seeing his thor.


 We used to say to Eaja, Ter (Tere) Kajyo (many) Nanteen (children) is Ghi Yaan (done here).

arjunbisht336
 Eja would laugh at this and said, "Hoy (yes), all the Nanteen (children) are then (my), Myar (my), Inoken (her who loved them, Yo Karni Unuke (them) love, Ija was everyone's love").


 In the morning, having tea, having bath water in a stove, making rotu (roti) by making pisu (flour) ol (knead) for breakfast, did not know how much work together.
arjunbisht336
 I never saw a mess on the face of Eja, who was busy working all day, always kept a smile on her face.


 Bade da (elder brother) was given a second visit to Eaja, lived with Eaja all day, and kept trying to work like him.

arjunbisht336
 Ija was one, but everyone had her demand, often I used to feel like Ija computer, because she used to play every work as a mechanic.


 Eaja's hand-made bread tasted wonderful, the rotis on the stove on hand, when cooked on the pan, when roasted in the ghowa (stove), the pum would swell.

arjunbisht336
 The relationship between Eaja and the stove was unique, Eja would do the cooking of the stove delicately and in turn the stove would cook delicious food, it seemed as if both were with each other, what was it because both of them were seen with each other all day long.  .


 Eaja was the beauty of the house, Eaja was the tingle of the melodious tune, Ija was the basis of balancing the house!

arjunbisht336
 Scripted short story

 All rights reserved

टिप्पणियाँ

  1. आपकी हर कहानी बेहतरीन होती है पर कुछ समय पहले आपकी कहानी उर्मी पढ़ि भावनाओ को शब्दों मे आपने इस तरह पिरोया है आँख गीली हो गयी....... salute दाज्यू कुछ पहाड़ी वॉक्यूबलरी भी सुधर रही है

    जवाब देंहटाएं
  2. Bisht ji ,
    Aapki kahaniya hamare paharo ke pyar, bholepan aur sachchai ko behtareen tareke se byakt karati hai.
    Thanks

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बस एक छोटी सी कोशिश है , हमारे पहाड़ के परिवेश को कहानी के माध्यम से उकेर कर लोगों तक पहुँचाने की कनवाल जी.....

      हटाएं
  3. आपकी कहानी जीवन्त लगती है पढने में ।
    मुन्शी प्रेमचंद जी की याद आ गयी

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह ❤❤, अपने आप को शौभाग्यशाली मान रहा हु आपकी इस रचना को पढ़के...

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

Please give your compliments in comment box

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अपनापन - Affinity short Story in hindi

ज्योति पढ़ लिख कर इंजीनियर बन गई थी , ओर फिर नौकरी के लिये सिंगापुर चली गई , काफी सालों से पहाड़ नही आई , यदा कदा फोन पर जरूर बात हो जाती थी।  short Story in hindi एक दिन ज्योति का फोन आया सिंगापुर से , की दद्दा जयपुर हो या पहाड़ , मैंनें उससे कहा की गर्मियों में तो तुम्हारा दद्दा पहाड़ों पर ही मिलेगा।  ये सुनकर ज्योति बोली दद्दा बहुत सालों से पहाड़ नही गई , बहुत मन कर रहा है वहाँ जाने का।  ओर उसका मन करता भी क्यों नही , क्योंकि पहाड़ी कहीं भी रह ले , उसके दिल के एक कोने में पहाड़ के प्रति प्रेम जरूर रहता है , ओर जिस दिन ये प्रेम उमड़ पडता है , वो भाग कर पहाड़ों में चला आता है।  शायद ज्योति का भी पहाड़ प्रेम उमड़ आया था , इसलिये वो पहाड़ जाने के लिये बोल रही थी। short Story in hindi मैंनें कहा आजा थोडा पहाड़ घूम कर तसल्ली हो जायेगी , वो बोली दद्दा इस बार अपने गाँव जाना चाहती हूँ , हिल स्टेशनों कि बजाय , इसलिये आपको चलना होगा मेरे साथ , मैं तो अब रास्ता भी भूल सी गई वहाँ का।  मैंनें कहा तू आजा फिर चलते हैं तेरे गाँव इस बार , तेरी कुड़ी ( मकान ) का तो पता नही...

बसंती दी

। बसन्ती दी जब 15 साल की थी ,तब उनका ब्या कर दिया गया ,ससुराल गई ओर 8 साल बाद एक दिन उनके ससुर उन्हें उनके मायके में छोड़ गये ,ओर फिर कोई उन्हें लेने नही आया ,बसन्ती दी के बौज्यू कई बार उनके ससुराल गये ,पर हर बार उनके ससुराल वालों ने उन्हें वापस लेने से ये कहकर  इंकार कर दिया की ,बसन्ती बाँझ है ओर  ये हमें वारिस नही दे सकती तब से बसन्ती दी अपने पीहर ही रही।  बाँझ होने का दँश झेलते हुये बसन्ती दी की उम्र अब 55 के लगभग हो चुकी थी ,उनके बौज्यू ने समझदारी दिखाते हुये 10 नाली जमीन ओर एक कुड़ी उनके नाम कर दी थी ,ताकि बाद में उनको किसी भी प्रकार से परेशानी ना हो ,ओर वो अपने बल पर अपनी जिंदगी जी सके। बसन्ती दी ने उस जमीन के कुछ हिस्से में फलों के पेड़ लगा दिये ओर बाकि की जमीन में सब्जियाँ इत्यादि लगाना शुरू किया ,अकेली प्राणी ठहरी तो गुजारा आराम से चलने लगा ,भाई बहिनों की शादियाँ हो गई ,भाई लोग बाहर नौकरी करने लगे ,वक़्त बीतता चला गया। बसन्ती दी शुरू से ही मिलनसार रही थी ,इसके चलते गाँव के लोग उनका सम्मान करते थे ,ओर खुद बसन्ती दी ...

देवता का न्याय

थोकदार परिवारों के ना घर में ही नही ,अपितु पूरे गाँव में दहशत छाई हुई थी ,कुछ दिनों से थोकदार खानदान के सारे घरों में ,घर के सदस्यों को पागलपन के जैसे लक्षण देखने को मिल रहे थे ,यहाँ तक की गाय भैंसों ने भी दूध देना बंद कर दिया था ,किसी को समझ नही आ रहा था की आखिर ये हो क्या रहा है। पहाड़ में अगर ऐसा होना लगे तो ,लोग देवी देवताओं का प्रकोप मानने लगते हैं ,ओर उनका अंतिम सहारा होता है लोक देवताओं का आवाहन ,इसलिये थोकदार परिवारों ने भी जागर की शरण ली। खूब जागा लगाई काफी जतन किये ,पर कौन था किसके कारण ये सब हो रहा था ,पता नही लग पा रहा था ,जिसके भी आँग ( शरीर ) में अवतरित हो रहा था ,वो सिर्फ गुस्से में उबलता दिखाई दे रहा था ,पर बोल कुछ नही रहा था ,लाख जतन कर लिये थे ,पर समस्या ज्यों की त्यों थी ,गाँव वाले समझ नही पा रहे थे की आखिर थोकदार परिवार को इस तरह परेशान कौन कर रहा है ,ओर तो ओर जगरिये उससे कुछ बुलवा नही पा रहे हैं ,अंत में गाँव में आया हुआ एक मेहमान बोला मेरे गाँव में एक नौताड़ ( नया ) अवतरित हुआ है ,उसे बुला कर देखो क्या पता वो कुछ कर सके ,थोकदार परिवार ने दूसर...