देब्बू बचपन से ही गाँव में पला था,जब वो छोटा सा था, बड़ा प्यारा लगाता था, गोरा रंग था ओर बड़ा चंचल था। गाँव के स्कूल से ही इन्टर ( बारहवीं ) करने के बाद, गाँव में ही रहकर कुछ करने की सोच रखने वाला देब्बू , खूब इधर उधर काम की तलाश में घूमा, पर उसे कोई काम नही मिल पाया। आखिरकार घर की परिस्तिथियों को देखते हुये उसे भी, बे मन से गाँव के अन्य युवाओं की तरह ही पलायन कर रोजगार की तलाश में बाहर जाना पड़ा। इस तरह देब्बू दिल्ली पहुँच गया, वहाँ उसके गाँव के एक लड़के ने उसे हैल्परी के लिये अपने साथ बेकरी में रखवा दिया, जहाँ बिस्किट्स, केक, टोस्ट, क्रीमरोल इत्यादि बनते थे, इस तरह देब्बू को रोजगार मिल गया। देब्बू काफी मेहनती तो था ही, साथ ही कुछ सीखने की चाह भी थी, इसलिए वो हर काम को मन लगाकर सीखता गया ,ओर दो तीन साल में ही देब्बू पूरा बेकरी मास्टर बन गया। अब देब्बू की जिंदगी ठीक ठाक चल ही रही थी के ,अचानक कोरोना की बीमारी आ जाने से, सारे काम धाम रुक गये। देब्बू भी इससे अछूता नही रहा ,इस बीमारी के कारण उसकी बेकरी भी बंद हो गई, ओर देब्बू फिर बेरोजगार हो गया, अब दे...
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