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बहादुरी का पर्दाफाश - Bravery exposed

हम जैसे प्रवासियों को पहाड़ों में दो चीजों का डर लगने वाला हुआ ,एक तो छोव ( भूत ) का ओर दूसरा ठहरा बाघ का। भले ही हम लोग कितनी ही शेखी क्यों ना मार लें,पर अंदर ही अंदर डर तो लगने वाला ही हुआ। दिन भर चौड़ी छाती करके घूमने वाले हम जैसे लोग रात होते ही भीगी बिराऊ ( भीगी बिल्ली ) जैसे बन जाते। रात आठ बजते बजते खा पी कर टुप्प ( चुपचाप ) से बिस्तर में घुस जाते ओर फिर जब अच्छा उजाला हो जाता, तब ही बाहर को निकलते। हम से अच्छा तो वहाँ का छोटा बच्चा होता, जो लघु शंका आने पर धड़ाक से दरवाजा खोल कर बाहर निकल जाता ,हम जैसे तो सुबह होने का इंतजार करते रहते। सुबह होते ही फिर से निडर बनने का दिखावा करने लगते, मगर कभी कभी ये दिखावा भारी पड़ जाने वाला हुआ, ओर एक बार ऐसा ही हुआ। एक बार की बात है की,हम गये थे गाँव ,ओर साथ हमारे कुछ शहरी मित्र भी थे,अब जब शहरी मित्र साथ हो तो,पहाड़ी होने के नाते बहादुर दिखना तो ठहरा ही, तो उस ग्रूप में सबसे बहादुर में गिनती हुई हमारी, सारे मित्र चुपचाप हमारे कहे अनुसार रह रहे थे,बहादुर बनने के चक्कर में हमनें उन्हें ओर डरा रखा था। हमनें उनको भूत से लेकर बाघ जैसे खतर...