माटसाहब ठहरे अपने जमाने के खुर्राट मास्टर , गणित के अध्यापक थे इसलिये थोडा ओर खुर्राट लगते थे छात्रों को। भेकुव के सिकाड ( डंडी ) के साथ जब कक्षा में आते तो , पढ़ाई से मन चुराने वाले छात्र , मन ही मन ये प्रार्थना करने लग जाते की हे ईष्ट देबता आज बचा लिया , बस भोव बठी पक्क पढूँन ( हे ईश्वर आज बचा लेना , कल से पक्का पढ़ लेंगें), इतना खौफ था नैन सिंह माटसाहब का। ओर हो भी क्यों ना , वो सिर्फ कक्षा में ही नही मारते थे , अपितु शाम को उद्दंडी छात्र घर जाकर, उसके पिता के सामने ओर सिकडा ( सटका ) देते थे , उनके इस खौफ के कारण कई छात्रो का भला भी हो गया ठहरा। उनके पढ़ाए छात्र आज अच्छी अच्छी जगह नौकरियों में हैं , नैन सिंह माटसाहब केवल स्कूल से ड्यूटी शुरू नही करते थे , अपितु स्कूल जाते समय आसपास के छात्रों को सँग ले जाते थे। पढ़ाने के साथ साथ स्कूल के प्रति गजब का समर्पण ठहरा उनका , ओर नौकरी पूरी करने के बाद भी शिक्षा से सरोकार नही टूटा उनका। आज भी उसी स्कूल में बच्चों की एक्स्ट्रा क्लास लेने बिना नागा किये जाते हैं , साथ ही ऐसे बच्चों की मदद करते ...
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