हुनरमंद मेरे एक मित्र ने एक पोस्ट भेजी की, पहाड़ गये हो तो इस जगह जा आना, वहाँ एक बुजुर्ग रिंगाल ( एक तरह की बाँस की प्रजाति ) से खूबसूरत सामान बनाते हैं, उन पर एक कहानी लिखोगे तो खूबसूरत लगेगी। बस फिर क्या था मैं निकल पड़ा अपनी तैयारी करके, जगह नई थी, ओर अनजानी भी, पर हमारे पहाड़ के लोग इतने मिलनसार होते हैं की, इस बात की फिक्र नही थी की, वहाँ कोई परेशानी आयेगी, ओर मैं तो मूलतः वहीं का हुआ तो, भाषा की भी समस्या भी नही थी। मोटरसाइकिल से सफर प्रारम्भ हुआ, रास्तों के सुँदर नजारों का आनंद लेता हुआ, बढता गया गंतव्य की ओर , एक जगह रोड किनारे बने रेस्टोरेंट में नाश्ता कर थोड़ी पेटपूजा की ओर फिर आगे का रास्ता पूछ कर निकल पड़ा सफर की ओर। पहाड़ के नजारे देखते हुये कब गंतव्य के समीप पहुँच गया पता ही नही चला। यहाँ से एक सड़क ऊपर की ओर जा रही थी, ओर जहाँ मुझे जाना था वो इस जगह से 4 किलोमीटर पर था, सड़क कच्ची थी, शायद हाल ही में बनी थी, आजकल प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत पहाड़ों में सड़कों का जाल सा बिछ गया है, इससे लोगों कों काफी सहूलियत हो गई है। ...
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