पन्नू गाँव का ढोली ( Traditional instrumentalist ) था, ह मनें बचपन से ही उसे ओर उसके परिवार को ढोल किनडी बजाते हुये देखा था। पीतल के खोल पर बकरी की खाल का चमड़ा चढ़ा हुआ हुआ उसका ढोल अलग ही चमकता था। Traditional instrument कुल देवता हरज्यू के थान ( मंदिर ) में हो या देवी के मंदिर में हो पन्नू के ढोल से ही शुरुआत हुआ करती थी। हरज्यू के मंदिर में लगने वाली बासी ( बाईस दिन का पूजा समारोह ) में तो पन्नू का ढोल नाचने वालों के आँग ( शरीर ) में जोरदार भाव भर देता था। गाँव में कोई शादी हो या कोई मांगलिक कार्य हो तो पन्नू ढोली का ढोल ही रंगत लाता था, छुलेत भी पन्नू के बजाए ढोल में गजब का करतब दिखा जाने वाले ठहरे। पन्नू ढोली ओर खीमराम की जोड़ी तो रौनक बढ़ा देने वाली हुई महफिल की, पन्नू का ढोल ओर खीमराम का बीनबाजा दोनों मिलकर वो रौनक बना देते थे के, न नाचने वाला भी नाच जाने वाला हुआ। पसीने में तरबतर जब पन्नू , तल्लीन होकर ढोल बजाता था तो ऐसा लगता था जैसे किसी अलग ही दुनिया में खो गया हो, उसके ढोल की तान एक अलग ही माहौल पैदा कर देती थी, जहाँ सिर्फ हर्ष उल्लास...
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