कई लोग ऐसे होते हैं, जिनसे ना चाहते हुये भी काम बिगड़ जाते हैं, उन्हें पहाड़ ( उत्तराखण्ड ) में उटांगी कहा जाता है, ऐसे ही ठहरा गाँव का गुज्जू भी। गुज्जू से ना चाहते हुये भी काम बिगड़ ही जाते थे, इसलिए गाँव के लोगों ने उसका नाम ही गुज्जू उटांगी रख दिया ठहरा। वैसे गुज्जू हुआ बड़ा सामाजिक आदमी, गाँव के हर काम में ,सबसे आगे आने वाला वही होता था,पर उससे काम बिगड़ जाने के कारण ,उसे कोई विशेष या बड़े काम की जिम्मेदारी नही दी जाती थी, उसे छोटे मोटे काम सौपें जाते, ताकि कुछ उससे बिगड़ भी जाये तो विशेष फर्क ना पड़े। गुज्जू भी बिना हील हुज्जत उसे सौपा काम ,अपनी तरफ से ठीक करने की कोशिश करता, अब बिगड़े तो बिगड़े बल,गुज्जू को तो काम करने से मतलब। एक बार देवता के थान में पूजा का कार्यक्रम था, गुज्जू को भी न्यौता आया था, पूजा बड़ी थी, इसलिए काम भी बहुत था, तो गुज्जू सुबह ही थान ( मंदिर ) में पहुँच गया। गाँव के प्रधान ने गुज्जू को देखते ही कहा, गुज्जू आगो रे ( गुज्जू आ गया ) ये कें येक लायक काम दिया हाँ ( इसको इसके लायक ही काम देना हाँ )। ये सुनकर गुज्जू बोला यार प्रधान ज्यू येस क्याही कोण छा ( यार ...
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