दीनू गुरु के हाथ के पकाये दाल भात ओर टपकी की बात कुछ ओर ही ठहरी , स्वाद ऐसा की पेट भर जाये फिर भी थोडा ओर सपोडने का मन कर ही जाता था। दीनू गुरु भी बनाते बडे मन लगा करके , चावल को साफ धो धा कर ताँबे के तौले में डालने से लेकर , उसमें पानी डालने तक का , एक एक कार्य बडे मन से करते। ऐसे ही दाल को भडडू में पकाने के दौरान होता , काम बडे मनोवेग से किया जाता , चूल्हे में लकड़ियाँ कम ज्यादा करते रहते , जो शायद स्वाद के कारणों में से एक क्रिया थी , बीच बीच में कारिबारियों ( काम में सहयोग करने वाले लोग ) से चाय पीते हुये , मजाक ठटठा भी चलता रहता। पहाड़ में दाल भात की रसोई बडी पवित्र मानी जाती है , जो पंडित ही बनाते हैं ओर उन्हीं पंडितों में से एक थे दीनू गुरु। मैं जब भी जाता तो उन्हें दाल भात गुरु कहता , वो खूब हँसते ओर बोलते बिष्ट ज्यूँ आपने नाम जोर का रख मारा है बल मेरा , वो मेरे हमउम्र से थे , थोडा बहुत बडे होंगें ज्यादा से ज्यादा इसलिये थोडा मजाक चल जाने वाली हुई। पर सच कहूँ तो दाल भात की रस...
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