आज का पहाड़ काफी बदल चुका है, एक जमाना वो भी था जब पहाड में कई चीजों का अभाव था, आज बिजली की रोशनी में रात को चमकते गाँव कितने सुँदर दिखाई देते हैं, वहीं एक जमाने में बिजली तो छोड़ो, माचिस भी उपलब्ध होना बडी बात होती थी, अगेले से अग्नि प्रज्वलित की जाती थी, गाँव के अधिकतर लोग डाड़ू में,किसी हतर (पुराना सूती के कपडे ) में आस पड़ौस से आग माँग कर लाते ओर उसे फूँक-फूँक कर अपने घर में अग्नि प्रज्वलित करते थे, अंदर उजाला करने के लिये एक लैम्फू होता था या कड़वे तेल से जलया गया दिया , रात में इधर उधर जाते समय हमारे खोर खूब फूटे हुये हैं, आदत जो नही ठहरी, छोटे दरवाजों की, पर मजा खूब आता था स्कूल की छुट्टियों के दौरान गाँव रहने में। अधिकतर गाँवो में सड़क ही नही थी ,कईयों ने तो गाडियाँ ही नही देखी ठहरी, केमू की बसें भी ट्रकनुमा हुआ करती थी, वो भी हल्द्वानी से अल्मोड़ा ओर अल्मोड़ा से बागेश्वर, पिथौरागढ जैसे कुछ बड़े बड़े शहरों तक ही चलती थी, हम ऐसी ही बसों में बैठ कर कई बार गये पहाड़ को, ओर सड़क से 10 किलोमीटर पैदल यात्रा करके गाँव तक पहुँचते थे, अब तो सड़कों का जाल सा बिछ ग...
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