वो जंगल के बीच अकेली जाती दिखी तो , मैंनें पूछा अकेली जंगल जा रही हो , बाघ आदि जानवरों से डर नही लगता क्या , वो तपाक से आसी दिखा कर बोली , यो छू मेर पास ( ये है मेरे पास ) जो आल काट दयोण ( जो आयेगा काट दूँगी ) मैं उसे देखते रह गया या कहो उसकी हिम्मत को देखते रह गया , चेहरे पर लेशमात्र भी डर का नामोनिशान नही था उसके , जबकि मेरा जैसा घुमक्कड़ भी शाम होते ही थोड़ा घबराया हुआ सा रहता था , पहाड़ों में घूमने के दौरान , पर वो छोटी सी बच्ची जिसकी उम्र लगभग 10 या 11 साल की होगी , बिल्कुल बेखौफ होकर जंगल की ओर जा रही थी। मुझे भी जंगल घूमने के लिये एक दगड़ी ( साथी ) मिल गया था , वो भी बहादुर दगडी , तो मैंनें उससे कहा , चल मैं भी चलता हूँ तेरे साथ , तू मुझे जंगल घूमा देना , वो तपाक से बोली , हिटो मना को करणों ( चलो तो मना कौन कर रहा है )। मुझे भी इस वक़्त इससे बेहतरीन दगड़ी कौन मिल सकता था , जो बहादुर तो थी ही , साथ ही जंगल से परिचित भी , चलते चलते बात शुरू कर दी मैंनें , शुरुआत नाम पूछने से हुई , तो उसने बताया नाम तो सरला ठहरा बल स्कूल में , पर गों में सब सरुली बुलाते हैं , कक्ष...
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