बिन्नू यही रखा था खुशाल दा ने इसका नाम , बहुत छोटा सा लाये थे अपने दोस्त के घर से इसको , ये कह कर के ईजा अकेली रहती है घर पर , उसका दगड़ी बन जायेगा ये , ओर सच में बिन्नू खुशाल दा की ईजा का दगडी ही बन गया। गाँव धीरे धीरे खाली हो गया ओर बस खुशाल दा की ईजा व एक आद बुजुर्ग ही रह गये इस गाँव में , जवान व देखभाल करने वाले के नाम पर बस बिन्नू ही था साथ , ओर बिन्नू भी अपना फर्ज बख़ूबी निभा रहा था। गाँव में क्या मजाल जो अजनबी आ जाये , अड़ कर बैठ जाता था , तब ही हटता जब खुशाल दा की ईजा या गाँव में रहने वाले बुजुर्ग में से कोई , उसे चुप हो जाने के लिये कहते। बिन्नू की वजह से उस गाँव में कोई अजनबी जाने की हिम्मत नही करता था , किसी को जाना भी होता था तो , आधा किलोमीटर दूर से ही , अपने आने की सूचना , जोर जोर से बोल कर दे देता था , ताकि बिन्नू उन्हें आने दे। बिन्नू की इस आदत से जहाँ कई लोगों को परेशानी होती थी , वहीं गाँव में रहने वाले अकेले बुजुर्गों में सुरक्षित होने का अहसास भी जागता था। बिन्नू सबका चहेता था , इसलिये खाने पीने की समस्या नही ठहरी , दूध ...
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