जम्म बू द्वारा बनाई गई चूड़कानी बडी स्वादिष्ट होती थी , पता नही क्या डालते थे की , खाने वाला अंगुलियाँ ही चाटता रह जाता था। जब भी गाँव जाना होता तो , जम्म बू के हाथ की चूड़कानी खाये बिना नही लौटता , भात के साथ चूड़कानी का स्वाद बड़ा मस्त लगता था। जम्म बू भात भी बरबरान ( ना सूखा ना ही गीला ) बनाते , जिसमें चूड़कानी मिला कर खाने का मजा ही कुछ ओर होता था। आँगन में लगे चूल्हे पर भात ओर चूड़कानी पकती , जिसे जम्म बू बडे मनोवेग से पकाते , साथ में लाई के पत्तों (राई के पत्तों का साग ) का टपकिया भी होता था। मेरा जैसा व्यक्ति जो कम खाता था , वो भी दो बार भात डलवा लेता , ओर चूड़कानी कितनी बार डलवा लेता ये तो गिनता नही था , साथ में टपकिया भी माँग लेता। खाते खाते ये भी सोचता की , बूबू क्या सोचेंगे की कितना खा रहा है ये , पर पेट बोलता माँग ले , फिर पता नही कब मिले ऎसी चूड़कानी , ओर मैं पेट की सुन कर माँग लेता था। बूबू भी कहते शरम जन करिये ला (शर्म मत करना ) , तेर थ ले बना राखो (तेरे लिये भी बनाया है ) , तेर आमे ली बता राख छी की तू आरे ...
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