कविता जब बहुत छोटी थी, तब गाँव में अपने आमा बूबू ( दादा दादी ) के साथ, काफी समय तक रही थी, उसे हमेशा से ही अपना गाँव बेहद पसंद था। कविता को बचपन की यही यादें हमेशा से पहाड़ लौटने को मजबूर करती रही, वो भारत भर में घूम चुकी थी, अपने बाबू ( पिता ) की नौकरी के चलते, उसके बाबू फौजी अफसर थे। अँग्रेजी माध्यम में शिक्षित कविता को अपनी बोली से भी बड़ा लगाव था, जब भी गाँव आती तो, सबसे अपनी ही बोली में बात करती। वो हमेशा से अपने बाबू को कहा करती, बाबू हमारा इलाका बहुत पिछडा हुआ है, इसलिए वहाँ के युवा लगातार पलायन कर रहे हैं, गाँवों की रौनक लगातार फीकी पड़ रही है, कुछ करना चाहिये हम जैसे लोगों को, वरना कभी ये गाँव बिल्कुल उजाड़ हो जाएँगे। कविता के बाबू तब उससे कहते, नौकरी पूरी होने के बाद जरूर चल कर कुछ करेंगे, अभी तू पढ़ाई में ध्यान दे। कविता के मन मष्तिष्क में तो गाँव बैठा हुआ था, तो उसने स्कूली पढ़ाई खत्म होने के बाद, उत्तराखण्ड की पृष्ठभूमि को देखते हुये टयूर व ट्रेवलिज्म की पढ़ाई को चुना, ताकि वो उत्तराखण्ड जाकर इस क्षेत्र में कुछ कर सके। तब टयूर ट्रेवलिज्म में तीन साल का डिग्री कोर...
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