सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

उत्तराखण्ड की पृष्ठभूमि से जुड़ी लघु कथा कल्लू ओर झल्लू लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कल्लू ओर झल्लू

पन्न दा के घर कुतिया ब्याई थी , दो पोथ ( कुत्ते के पिल्ले ) दिये ठहरे उसने , पन्न दा ने उनका नाम रख दिया ठहरा कल्लू ओर झल्लू , बडे मस्त दिखने वाले ठहरे , अजनबी को देख कर भौंकते , पर डर डर के बल , बच्चे ही जो ठहरे , पर थे बडे मस्त।  अपनी माँ के दूध के अलावा पन्न दा द्वारा दिया गया दूध धपड धपड़ पी जाने वाले ठहरे , ओर फिर खाव में दे दौड़ा दौड़ काटते फिरते , उनको देखने में बड़ा आनंद आता था , उनकी बाल सुलभ हरकते बडी मासूम होती थी।  पूरी बखई वाले के दुलारे थे वो दोनों , चिड़िया दिख जाये तो बस उसके पीछे लग जाते दोनों , उसको पकड़ने के चक्कर में कई बार घुरि भी जाते थे भिडो में , फिर भी पीछा करना नही छोड़ते थे , फिर जब थक जाते तो जिबडी ( जीभ ) बाहर निकाल कर हाँफने लगते।  पूरा दिन इधर से उधर दौड़ काटते फिरते , पेट खाली होते ही पन्न दा को ढूँढ़ते , पन्न दा मिल जाते तो , भौंक भौंक कर अपनी भूख के बारे में बताते।  पन्न दा भी जानते थे की क्यों भौंक रहे हैं दोनों , पन्न दा उनके भौंकते ही बोलते , हिटो रे ( चलो रे ) घर को , वहाँ दूँगा तुम्हें द...