गाड ( नदी ) किनारे हमारे छान से ही कुछ दूरी पर दलीप की कुड़ी ( मकान ) थी , जहाँ हम लोग सर्दियों में ही गाड ( नदी ) किनारे वाले छानों में ही रहने आते थे, वहीं दलीप बारहों मास गाड ( नदी ) किनारे वाली कुड़ी ( मकान ) में अपने परिवार के साथ रहता था। उनका पानी का घट ( पन्नचक्की ) था ,ओर वही उनकी आजीविका का मुख्य साधन था। गाड का अगर मेरा कोई उस वक़्त कोई सबसे प्रिय साथी हुआ करता था तो वो था दलीप। हम दिन भर नदी में खेला कूदा करते, मछली पकड़ा करते ओर विभिन आकारों के पत्थर इकट्ठा किया करते थे,ओर उन्हें अलग अलग ढंग से सजाया करते थे, दलीप इस काम में उस्ताद ठहरा। मेरी गर्मियों की छुट्टी खत्म होते ही, मुझे फिर शहर लौटना पड़ता ओर हम फिर एक साल के लिये बिछुड़ जाते। वक़्त बीतने के साथ ही दलीप ओर मेरे बीच की दूरियाँ बढ़ती चली गई। पढ़ लिख कर जहाँ मैं शहर में ही रह गया था तो, दलीप वहीं गाड ( नदी ) किनारे से बाहर नही निकला, सुना था के वहीं रहकर अब घट ( पन्नचक्की ) चलाता है। व्यस्तता के कारण धीरे धीरे गाँव आना भी जहाँ कम हों गया था, वहीं गाड ( नदी ) जाना तो बिल्कुल छूट ही गया ठहरा! पर बड़ा मन ...
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