राम दत्त जी ,हर बार की तरह इस बार भी मिसरो लेने जजमानों के वहाँ गये, अब मिसरों मिलना भी पहले की तुलना में कम हो गया था,लोगों ने खेती करनी कम कर दी ,ओर कुछ लोगों की भावनाएं भी थोड़ी बदल गई ठहरी इसलिए राम दत्त जी को अब मिसरो लेना अच्छा नही लगाता था ,अब उन्हें अपने इस पुश्तैनी हक को लेने में वो आनंद नही आता था, जो आनंद उन्हें पहले आता था। पहले लोग पंडित का इंतजार करते थे, आने पर उन्हें सम्मानपूर्वक मिसरों दिया जाता था, अगर सामान भारी हो जाता था तो, उसे पंडित जी के घर तक छोड़ भी आते थे। वैसे राम दत्त जी के कोई कमी भी नही थी,बड़ा बेटा मास्टर बन गया था, ओर छोटा वाला जलदाय विभाग में बाबू,उन्हें मिसरों लेने क़ी जरूरत भी नही थी। पर कमी ना होते हुये भी राम दत्त जी मिसरों क्यों माँगते हैं, ये सवाल भी लोगों के जेहन में अवश्य आता होगा, ओर खुद राम दत्त जी को मिसरों माँगना अच्छा नही लगाता था, फिर भी वो मिसरों लेने जाते थे। राम दत्त जी अपनी पत्नी को कहते भी थे की,अब मन न करन मिसरों लिन्हे ( अब मन नही करता मिसरों लेने का) पर मजबूरी छ ( पर मजबूरी है ), जग्गू ल्वार ओर उक स्याणी भूख मर जाल ( ...
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