कहानी शिब्ब दा की गाँव के सारे लोग शिब्ब दा को शिब्ब दा कह कर ही पुकारते थे उनको, अब चाहे वो बड़ा हो या बच्चा। शिब्ब दा भी शायद आदि हो गये थे ,उन्हें कोई फर्क नही पड़ता था की कौन किस तरह संबोधित करता है। शिब्ब दा के आगे पीछे अपना कहने को कोई नही था, ना ही कोई खेती की जमीन थी, कहते हैं की बचपन में ही उनके ईजा बौज्यू मर गये थे,ओर शिब्ब दा को बच्चा देख लोगों ने उनकी जमीनें दबा ली, जायदाद के नाम पर अब उनके पास एक छोटी सी कुड़ी थी ,जिसमें शिब्ब दा अकेले रहते थे। अपनों के द्वारा लूटे गये शिब्ब दा के पास खाने कमाने लायक कोई साधन नही बचा होगा, जिससे वो अपना गुजारा कर सकें, तब शायद उन्होने दूसरों के जानवरों को चराने का काम शुरू किया होगा। शिब्ब दा की शादी भी नही हो पाई थी, या ये कहलो की उनका अपना कहलाने वाला कोई ऐसा व्यक्ति नही था जो उनके लिये कहीं रिश्ते की बात करता, इसलिए शिब्ब दा अब अकेले अपनी जिंदगी गुजार रहे थे,अब उनकी उम्र भी लगभग 70 के करीब हो चली थी। शिब्ब दा की दिनचर्या सुबह जल्दी शुरू हो जाती, वो सबसे पहले नित्यकर्म से निपटते ओर फिर आटा गूँथ...
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