सोब्बी का त्याग सोब्बी ओर तीन भाई व एक बहिन ठहरे , जहाँ बड़ा व छोटा पढ़ने में शुरू से ही होशियार थे ,वहीं सोब्बी का मन पढ़ाई में बिल्कुल नही लगाता था ,सोब्बी के बोज्यू (पिताजी ) ने खूब कोशिश भी की उसे पढ़ाने की, पर सोब्बी पढ़ा नही। इसके चलते उसकी घर में इज्जत भी नही थी, पर सोब्बी को इससे कोई फर्क नही पड़ता था ,वो अपने हाल में मस्त रहता था। इधर भाई लोग पढ़ लिख कर, अच्छी नौकरी पा गए थे ,बड़ा भाई बैंक में अफसर बन गया था तो छोटा इंजिनियरिंग कर अच्छी कंपनी में इँजिनियर बन गया। इसके चलते सोब्बी की इज्जत ओर कम हो चली थी घर व बाहर में, पर सोब्बी अपने हाल में मस्त रहता था। दोनों भाइयों की शादी के लिए रिश्ते आने लग गए थे, पर सोब्बी के लिए नही आए, भला कम पढ़ें व नौकरी ना करने वाले को कौन अपनी लड़की देता, आखिर थक हार कर सोब्बी के बोज्यू ( पिताजी ) ने बड़े व छोटे की शादी कर दी,सोब्बी कंवारा ही रह गया। छोटी बहिन की शादी भी अच्छे परिवार में हो गई थी,अब तो सोब्बी की इज्जत ओर कम हो चली थी,सब भाई बहिन जहाँ संपन्न ठहरे, वहीं सोब्बी बिल्कुल साधारण रह गया था उनके सामने, पर सोब्बी को इसका मलाल नही था,...
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