पहाड़ों में घास का अपना ही महत्व होता है, ओर उसे काट कर लाने वाली घसियारियों का स्थान भी महत्वपूर्ण होता है, बिन घास के ग्रामीण जीवन की कल्पना करना बेईमानी सा लगाता है, जिसमें पहाड़ों में तो बिन इन घसियारियों के कुछ भी संभव प्रतीत नही, एक तरह से पहाड के ग्रामीण जीवन में ये रीढ़ के समान है, जिसके बिना पहाड़ का ग्रामीण जीवन अधूरा सा है। इसलिए पहाड़ की घसियारियों की अलग ही बात होने वाली ठहरी, बड़े बड़े घुटाव से लेकर छोटे पुले काट कर लाना, वो भी ऐसे ऐसे दुर्गम जगह से की, देख कर ही कलेजा मुँह को आ जाये। ऐसी ही एक घसियारी ठहरी बचुली, घास काटने में उसका मुकाबला शायद ही कोई कर पाये, भेवों ( खड़ी चट्टान ) से लेकर एक दम सीधे रूखो ( पेडों ) से घास काटना उसके लिये बायें हाथ का खेल सा था। उसको घास काटते देखने भर से ही, देखने वालों के दिल की धड़कन ,बढ़ सी जाती थी, पर वो थी की ,आराम से घास काट लेती थी। बचुली पूरे इलाके में घास काटने के मामले में प्रसिद्ध ठहरी, कोई उसके मुकाबले में नही ठहरता था, लोग कहते थे की, ये म्यास ( आदमी ) कम घ्वेड ( हिरण की प्रजाति ) बाकि छ (ज्यादा है ) ओर ये बात सच भी लगती थ...
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