हमारे गाँव की बचुली , चंपा ओर भागुली काखी,आज गाँव की तरफ वाले बाट (रास्ते ) पर, बडी खुश होकर जाती दिखी। वो भी सर पर बडे बडे बैग रखे हुये , तो मैंनें पूछा आज कां बैठी ओन छा ( कहाँ से आ रहे हो ) येतुक माल ताल ली बेर ( इतना मालताल ले कर )। तो तीनों एक साथ बोल उठी , होई माल ताल छ ( हाँ माल ताल है ) च्याल जो आ गई परदेश बैठी ( बेटे जो आयें हैं बाहर से ) उई भे हमर असली माल ताल तो ( वो ही तो हैं हमारे असली माल ताल )। सही तो कह रही थी तीनों , परदेश से लाडलों का लौट कर आना , उत्तराखण्ड की ईजाओं ( माँओं ) के लिये , किसी माल ताल से कम कहाँ ठहरा। अपनों से यों मिलने का सुख तो वही अनुभव कर सकता है...! जिसका कोई पुत्र या पति काफी दिनों बाद घर लौट कर आता है। वही सुख इन तीनों के , चेहरे पर भी झलक रहा था। उनके आने की इतनी बेसब्री थी की , वो तीनों घंटों से सड़क किनारे बैठ कर , अपने लाडलों का इंतजार कर रहीं थी। हर आती हुई गाड़ियों को टकटकी लगा कर देख रही थी , के शायद इसमें आ गये उनके लाल। फिर उनके गाड़ी से उतरते ही...
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