बचपन में गाँव में जाकर , खेतों में जाना बहुत ही बढ़िया लगता था बल , खासतौर पर तब , जब खेत की जुताई बुवाई चलती थी। घर के गोठ से बल्दों ( बैलों ) को खेत तक ले जाने का अपना ही आनंद होता था , हल लेकर जाते हुये ठुल बोज्यू पीछे पीछे , बैलों को लेकर जाते। खेत पर होती फिर जुताई की तैयारी , बैलों के कँधों पर जू डाल कर , उन्हें तैयार करना ओर फिर होती जुताई। वहाँ हमारे लिये सिर्फ वहाँ दो ही काम होते , एक तो जुताई के दौरान हल के पीछे पीछे चलना बल , ओर दूसरा होता घर जाकर ठुल ईजा को बोलना की खाना पानी ले आओ। दोनों कामों में से सबसे ज्यादा आनंद आने वाला ठहरा , बैलों के पीछे पीछे जाना , क्योंकि हमको लगता था जैसे , हम ही खेत जोत रहे हैं , ओर ठुल बोज्यू की तरह जुताई के दौरान आवाज निकालते थे , तब हमें ऐसा लगता था आवाज नही निकालेगे तो खेत नही जुतेगा। उधर ठुल ईजा के आते ही ख़ुशी डबल हो जाती थी , क्योंकि हल के पीछे चल चल कर भूख जो लग जाती थी , हम ही नही बल्द भी ठुल ईजा को देखकर खुश हो जाते थे , वो डवाँ डवाँ करने अड़ाने (आ...
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