गोपाल आठ साल पहले गाँव छोड़ कर निकल गया था , शायद गाँव में उसे भी अपना कोई भविष्य नजर नही आया था। गोपाल अन्य युवाओं की तरह , ना ज्यादा पढ़ा लिखा था , ना ही कोई हुनर था , ऐसे में अच्छा रोजगार तो क्या मिलता , हाँ गाजियाबाद में एक अचार फैक्ट्री में हैल्पर की नौकरी मिल गई , वो भी उसके किसी रिश्तेदार के मार्फत। अचार फैक्ट्री में कई तरह का अचार बनता था , गोपाल का काम था , कच्ची सामग्रियों में अपने उस्ताद के कहे अनुसार मसाले डालना , इस तरह अचार बनाना सीख गया था। किस अचार में , किस तरह का मसाला डालना है , कितना डालना है , कैसे उसे गलाना है , यानी बहुत कुछ सीख लिया था उसने। वो आसपास के एरिया में अचार सप्लाई करके अतिरिक्त कमाई भी कर लेता था , रोजी रोटी आराम से चल रही थी। पर अचानक कोरोना बीमारी फैल गई , ओर आराम से चलने वाली रोटी रोजी में संकट आ गया ठहरा , फैक्ट्री बंद पड़ गई , ओर गोपाल बेरोजगार हो पड़ा , शहर में रहना , वो भी किराये के मकान में रहना , अब भारी पड़ रहा था गोपाल को। खाली बैठे बैठे कब तक खाता , इसलिये श्रम...
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