गीतुल काखी ( चाची ) ने विवाह पश्चात , अपनी ज़िंदगी शहरों में ही बीता दी थी। काक (चाचा ) को छुट्टियाँ कम ही मिलती थी , इसलिये पहाड़ जाना भी कभी कभार ही हो पाता था ओर सब कुछ ठीक होते हुये भी गीतुल काखी को पहाड़ न जाने का अफसोस होता था। पर शहर में रहकर भी गीतुल काखी अपने तीज त्योहारों के माध्यम से अपने पहाड़ प्रेम को जीवित रखे हुये थी , घर में अपनी भाषा में वार्तालाप करना ओर बच्चों को भी बोलने के लिये प्रेरित करना , गीतुल काखी का पहाड़ प्रेम दर्शाता था। घर के बडे व बच्चे जब पहाड़ी भाषा में बोलते तो , बडे प्यारे लगते थे। गीतुल काखी ने अपने पहाड़ प्रेम के चलते , पूरे घर को पहाड़मय बना रखा था , तीज त्योहारों में ऐपण , हरियाव व गंगा अवतरण दिवस पर घर की देहरी पर गंगा दशहरा द्वार पत्र अगर कहीं दिखता था तो , वो घर होता था गीतुल काखी का। गजब की पहाड़ प्रेमी थी गीतुल काखी , कभी हम उनसे कहते भी थे , काखी ( चाची ) तुमुली तो ( तुमने तो ) पुर पहाड़ी ( पूरी पहाड़ी ) संस्कृति अपना राखे याँ (रखी है यहाँ ) बल , तुम...
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