प्रताप दा देखने में ही नही अपितु आंतरिक दृष्टि से भी मजबूत थे,इसका कारण था, उनका खानपान। प्रताप दा एक तो शुरू से ही गाँव में रहे ओर दूसरा अच्छा खाया पिया, शुद्ध हवा, शुद्ध पानी ओर जैविक विधि से उत्पन्न खाद्य पदार्थ। प्रताप दा की आजीविका भी इन्ही चीजों की बदौलत चलती थी,इसके चलते उन्हें गाँव छोड़ कर भी बाहर नही जाना पड़ा। अपने ही खेतों में सब्जियाँ ओर अन्य चीजे उगा कर, उन्हें गाँव के बाजार में बेचते, उसी से उनकी अच्छी दर गुजर चल जाती। प्रताप दा खुद भी अपनी उगाये सब्जियाँ व अनाज ही खाते थे उन्होनें अन्य लोगों की तरह कभी बाजार से नही खरीदा ठहरा। दिखने में ठिगने कद के प्रताप दा में ताकत गजब की हुई, गाँव में किसी का पाख का भरान ( छत की बल्ली ) लानी हो या कोई ओर भारी भरकम काम हो, तब प्रताप दा को ही याद किया जाता। प्रताप दा भी अपने शारारिक बल व अनुभव से उस काम को आसानी से कर देते थे। प्रताप दा बड़े मेहनती इंसान थे, सुबह उठ कर धारे में नहा धो कर पानी भर कर लाते, जब तक बोजी ( प्रताप दा की पत्नी ) गाय भैंस का दूध निकाल कर लाती, तब तक चाय का पानी गर्म क...
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