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गोपुली आमा

गोपुली आमा पार फाट की बाखई ( मकानों की कतार ) में रहती थी ,सुबह जल्दी उठना ओर नहा धो कर पूजापाठ करना उनकी दैनिक दिनचर्या होती थी। उसके बाद शुरू होते थे उनके अन्य कार्य ,जै से बूबू ( दादा ) ओर खुद के लिये टम ( ऊपर तक भरे ) दो गिलास चाय बनाना , ओर फिर बाहर आँगन में बैठ कर पीना। बूबू का हाथ रोज चाय पीते समय भडी ( जल ) जाता ओर चाय छलक जाती तो ,बूबू झल्लाहट में बोल उठते , यो लह गो रे चाहा तेर गुदी (सिर ) में , गोपुली आमा भी जवाब देते कह उठती , ठंड हुन दिना (ठंडा होने देते ) तूमूके ले जल्दीबाजी बहुते छ ( तुमको बहुत जल्दी बाजी है ), रोज हाथ भड़िया दी छा ( रोज हाथ जला लेते हो), मैं ले तो पी छू रोज (मैं भी तो पीती हूँ रोज ), मेर हाथ तो न भडीन ( मेरा हाथ तो नही जलता )। तब बूबू बोलते धोती में पकड़ बेर पी छे कस्ये भड़ेल ( धोती से पकड़ कर पीती है कैसे जलेगा ), भोव बे मैं ले तेर धोती पहन बेर पीन ठीक छ ( कल से मैं भी तेरी धोती पहन कर पिऊगा ), फिर बड़बडाते हुये चाय पीने लग जाते थे। दोनों के बीच गजब नोंकझोंक होती रहती थी , पर गोपुली आमा थोडा इधर उधर चल दे तो बूबू की हालत खराब हो उठती , आँगन म...