सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

पहाड की आबोहवा लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आमा

हमारे गाँव में घर के पास रहने वाली ठहरी आमा,सब उन्हें मोहर आमा बोलते थे ओर उनकी हमउम्र साथी उन्हें मोहर बुडी बोलती थी। मोहर क्यों लगाते हैं, उनके आगे ये पूछने पर हमारी ठुलईजा ( ताई ) ने बताया की इनका मायका महरा लोगों के वहाँ ठहरा तो इसलिए लोग इन्हे मोहर बुडी या मोहर आमा बुलाने लग गए। आमा उम्र के हिसाब से बहुत चुस्त तंदुरस्त थी सारा काम खुद ही कर लेती थी, बूब ( दादा ) थे नही, बस एक बेटी व बेटा थे ,बेटी की शादी कर दी थी ओर बेटा मुंबई में नौकरी करता था, तो उसके बच्चे भी वहीं थे। आमा भी एक बार मुंबई गई थी बल, जैसे उन्होनें बताया, बोली पोथिया, मैं ले गई वाँ ( मैं भी गई वहाँ ) पर वाँ जा बेर पगल जस है  गई ( पर वहाँ जाकर पागल जैसी हो गई ) ना वाँ हो छी ( ना वहाँ हवा थी ) ना छी उज्ज्याव ( ना वहाँ उजाला था ) बस वाँ बैठी एक हफ्त में वापस आगी ( बस वहाँ से एक हफ्ते में वापस आ गई ), मुझे आमा कि बात सुनकर बड़ी हँसी आई। वैसे हमारे पहाड़ के लोगों को  शहर ऐसे ही लगते हैं, जैसे की  आमा ने बतलाया, कहाँ पहाड़ की शुद्ध हवा पानी ओर कहाँ शहर का घुटन भरा माहौल, आदमी मजबूरी के चलते जरूर रह...