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उत्तराखण्ड की पृष्ठभूमि से जुड़ी लघु कथा ईजा की बडी लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ईजा की बडी

एक बार किसी काम से दिल्ली को गया था , वहाँ मेला लगा ठहरा उत्तरायणी का , मेले में खूब दुकाने भी लगी थी , घूमते घूमते एक दुकान पर नजर गई , वो उत्तराखण्ड के उत्पाद बेच रहा ठहरा।  गहत की दाल , बडी , मुण्डु का आटा , भाँग के बीज , गेठी , सिल पिसी नून , मसाले ओर भी ना जाने क्या क्या।  बडी देखी तो खरीदने को मन मचल गया ठहरा , घर में बडी भी खत्म हो गई थी , भात के साथ बडी वो भी कुमिल की बडी मुझे बहुत पसंद थी , बस एक किलो खरीद लाया।  गाँव जाने तक का जुगाड़ हो गया ठहरा , गाँव में तो ठुल ईजा के हाथ की बडी मिल ही जाने वाली ठहरी।  घर वापस आने पर इतवार को बडी भात बनवाई , पर ठुल ईजा की बनाई बडी जैसा स्वाद नही मिल पाया , ठुल ईजा के हाथ में जादू था , उसकी बडी की महक ही भूख जगा मारने वाली ठहरी , बडी खाकर मजा तो आया , पर उतना नही आया जितना ठुल ईजा की बडी में आया करता था।   तब दिमाग ने कहा अगर ठुल ईजा की बडी बिकने लगे तो , लोगों को असली पहाड़ी बडी का स्वाद मिल सकता है , ये सोच कर घन्न दा को फोन किया , के ठुल ईजा से इस बार...