अभिशप्त - C ursed गाँव के गधेरे के पार, एक कुड़ी ( घर ) हमेशा मेरा ध्यान खींचती थी, अकेली कुड़ी (घर )पेडों के झुरमुटों के बीच अजीब सी दिखाई देती थी, कई बार मन किया की जाकर देखूँ, आखिर वहाँ रहता कौन है, क्योकिं रात के समय अक्सर आग जलती दिखाई देती थी, कुड़ी के आसपास पेडों का इतना झुरमुट था की ,वहाँ होने वाली कोई हलचल भी दिखाई नही देती थी। जब भी गाँव जाता, उस कुड़ी को देखने की जिज्ञासा होती, पर जिस किसी से कुछ पूछता तो,वो गोलमोल जवाब में बस इतना ही कहते की वाँ न जान ( वहाँ नही जाते ) पर क्यों नही जाते ये कोई नही बताता था। जब तक छोटा था तब तक ,कभी हिम्मत भी नही हुईं की, वहाँ अकेला जाया जाये ,गाँव के कोई साथी भी जाने को तैयार नही होते थे, एक बार गाँव के गोपाल को बडी मुश्किल से ,ये कहकर तैयार किया की दूर से देख आयेंगे, पर वो प्लान भी फेल हो पड़ा, पता नही कहाँ से उसके बौज्यू ने देख लिया, ओर फिर उसे सिकडाते हुये घर तक लाये, मेरी आमा को शिकायत कर,मुझे एक चाँटा खिलवा दिया,तबसे तो वहाँ जाने की तमन्ना ओर दब गई। मेरी आमा ने मुझे उस दिन के अलावा कभी नही मारा था, पर उस दिन की चटाक ने मुझे ये अ...
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