कमजोर शरीर, झुर्रीदार चेहरे से उनके अकेलेपन के दर्द साफ देखा जा सकता है, 80 साल की बसंती आमा ,जो पिछले कई साल से अपने घर में अकेले रहती हैं। बसंती आमा की यह दशा उत्तराखण्ड में बढ़ रहे पलायन से बुजुर्गों की दशा बयाँ करता है।old age peoples बसंती आमा का बेटा अपने बच्चों को लेकर रोजगार की तलाश में कई साल पहले गाँव छोड़ गया। search job उत्तराखण्ड से बड़ी संख्या में लोग रोजगार और बेहतर सुविधा की तलाश में गाँव छोड़कर जा चुके हैं। बसंती आमा अपनी भाषा में बताते हुये कहती है , अब कोई न ओन (अब कोई नहीं आता ) सब लह गी ( सब चले गए ) घर ले टूटनो ( घर टूट रहा है ) कोई देखण वाव नहा ( कोई देखने वाला नहीं है )। बसंती आमा अपने खाने को अपने कुड़ी ( मकान ) के सामने थोडा खाने लायक खेती कर अपना गुजारा कर रही है। गाँव में एक परिवार जो गाँव छोड़ना तो चाहता है ,लेकिन गरीबी के कारण छोड़ नहीं पा रहा है। अपने टूटी छत को दिखाते हुए वो बुजुर्ग कहते हैं, मेर कुड़ी टूटने (मेरा घर टूट रहा है ) एक द्धवी दयौ में भली कें टूट जाल ( एक-दो बरसात में ये घर पूरी तरह गि...
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