पहाड़ घूमने के दौरान , वो मुझे मिली ही ऐसी जगह के , एक बार को लगा की कुछ गड़बड़ तो नही। जगह ही ऐसी ही थी के, ऐसा ख्याल आना स्वाभाविक था , क्योंकि जहाँ वो बैठी थी उस जगह हर कोई नही जाता था , उसमें से भी विशेषकर बाहर से आया कोई शख्स तो कम से कम नही। मैं थोडा ऐसी ही शाँत जगहों की तलाश में रहता हूँ , इसलिये वहाँ पहुँचा था , ओर उसे देखा तो ख्याल आया के , कहीं कोई गड़बड़ तो नही , इसलिये तेजी से नीचे उतर कर उसके पास पहुँचा ओर देखा की ,वो एकटक झील को निहारने में खोई हुई थी , गौर से देखा तो लगा की ये तो , यहाँ के सौंदर्य में खोई हुई है। ये देख कर गड़बड़ वाला ख्याल थोड़ा दूर हुआ , पूछा तो पता लगा के टूरिस्ट थी , वो भी विदेश से आई हुई , पर थी यहीं की यानी एन आर आई उत्तराखण्डी , यही भीमताल के आसपास पितृ भूमि थी उसके बडे बूबू ( दादा ) की। देश आजाद हुआ तो यहाँ के फ़िरंगी चले गये , शायद उसके बडे बूबू ( बड़े दादा ) तब अंग्रेजों के वहाँ नौकरी करते होंगें , इसलिये उसके बडे बूबू को साथ ले गये होंगें। तब से कोई आया नही यहाँ , पहली बार वही आई थी , अपनी जड़ों को खोजते ...
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