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जग्गू बू

जग्गू बू ने सारा जीवन पहाड़ों में ही काटा ठहरा , शहर के नाम पर देखा ठहरा तो बल अल्मोड़ा या ज्यादा से ज्यादा भाबर।  कभी गये नही ठहरे शहरों की ओर तो , अल्मोड़ा जैसे शहर में घूमने में ही बास आती है बल बोल देने वाले ठहरे जग्गू बू , तो शहरों में आ जाते तो क्या बोलते।  पर शहरों में ना जाने का असर उन पर साफ नजर आता था , एकदम स्वस्थ ठहरे , ना कोई हारी ना कोई बीमारी , एकदम फिट।  नब्बे साल की उम्र में वो जो काम कर लेते थे , वो शहरों के बुजुर्गों के लिये तो अकल्पनीय होता है।  जग्गू बू जंगल से लकड़ी ले आते हैं , वो भी बड़ी सारी डाल काटकर , खेतों में काम कर लेते हैं आज भी।  जबकि इस उम्र में आदमी का चल फिर पाना भी दुष्कर कार्य हो जाता है।  जग्गू बू पता नही कहाँ से लाते थे इतनी एनर्जी , हम जैसे भी ना कर पायें उनके जैसे काम तो।  जग्गू बू से उनकी इस एनर्जी का राज पूछा तो वो बोले , देख पोथिया , हमने कभी बास वाली हवा नही खाई ठहरी , खाना खाया ठहरा शुद्ध बल , मुडुवा , मक्का की रोटी , ताजा ताजा साग खाया ठहरा , दही , दूध ओर घी को तो पूछो मत बल कितना खाया , आज भी खात...