उत्तराखण्ड में आज लोग अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं , अपना खानपान , अपना पहनावा सब धीरे धीरे छूटरहा है , अब तो थोडा बहुत तब देखने को मिलता है , जब कोई मांगलिक कार्य होता है कहीं , तब जरूर कुछ स्त्रियाँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में से पिछोडी व आभूषण धारण किये जरूर नजर आ जाती हैं वहीं कहीं कहीं लोग आज भी, अपनी संस्कृति , अपने खानपान व पहनावे को अपनाये हुये है ,उन लोगों को अपनी संस्कृति से गहरा लगाव है , उन्हें देख ऐसा लगा , जैसे 25 साल पुराने उत्तराखण्ड में घूम रहे हों , तब इस तरह का ही पहनावा प्रचलित था , हमारी आमा (दादी ) व ठुल ईजा (ताई ) , तब ऐसा ही पहनावा धारण करती थी , पता नही कितने पाट की तो घाघरी पहनती थी , गले में एक किलो का सुत (गहना ) पहना होता था , ओर हाथों में मोटे मोटे धागुले (हाथ में पहनने वाला कड़ा ) , कमर में चाँदी की कमर पेटी ( चाँदी से बनी बेल्ट ), कानों में कनफूल (ईयर रिंग ) , ओर नाक में हथेली से भी बडी नथ बल (नोज रिंग )। आज तो इतना पहन कर , चल भी ना पायें औरते , आदत जो नही रही अब , हमारा तब का वो खानपान कितना समृद्ध , व पौष्टिक थ...
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