किस्मत ओ परताप उठ रे, नौव जाबेर पाणी भर बेर ला, काम की तेर बाप करोल बोलते हुये ,प्रताप की काखी ने सोते हुये प्रताप को उठाया। प्रताप हड़बड़ा के उठा, हालाँकि बाहर अभी अँधेरा ही था,बाहर निकलने में प्रताप को डर भी लग रहा था, पर अपनी काखी से डरने वाले प्रताप का ,ये डर कम ही था, उसने तुरंत फौव उठाया ओर चल दिया नौले की तरफ। प्रताप के माँ बाप बचपन में ही मर गये थे ,तो उसके चाचा ने ही उसे पाला ठहरा , पर एक घरेलू नौकर के तौर पर, उससे ही सारे काम करवाए जाते, दिन भर प्रताप प्रताप की आवाजें आती रहती, पानी भरने से लेकर, घास काटने व गाय बकरियों को चराने का जिम्मा उसी का था, जिसके बदले उसे झिड़कियों के तड़के लगा रूखा सूखा भोजन मिल जाता, पहली नजर में देखने से ये लगता ही नही था की प्रताप इनका इतना सगा रिश्तेदार भी था, बल्कि वो इनका नौकर सा लगता था। प्रताप भी न जाने कैसे सह लेता था ये सब, कोई ओर होता तो कब का भाग चुका होता, पता नही क्या सोच कर रुका हुआ था प्रताप। प्रताप के कितने काम करने के बावजूद, उसकी काखी को उसकी कमी ही नजर आती थी, ओर वो उसे दिनरात कोसती रहती थी, उसे देख कर चा...
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