सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

उत्तराखण्ड की पृष्ठभूमि से जुड़ी लघु कथा झपरू लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

झपरू

झपरू जब छोटा सा था तब , धर दा उसे लेकर आये थे , दूध दही खा खा कर अब थोडा बड़ा हो गया था।   दिन भर हों हों हों करता इधर उधर घूमता रहता था , मधुली ठुल ईजा तो उसकी हों हों से बडी परेशान रहती थी।  वो झपरू के कारण वो गप्पे नही हाँक पाती थी , इसलिये दिन भर झपरू को गलियाते रहती थी।   झपरू भी मधुली ठुल ईजा के पास जाकर हों हों कर ही देता था , ओर मधुली ठुल ईजा की गाली चालू हो जाती थी बल।   त्वैक ( तेरे को ) बाघ रगोड ली जाल ( खींच कर ले जायेगा ) , त्वै ( तुझ ) में कीड़ पड़ जाल (कीड़े पड़ेंगे ) आदि आदि।  फिर लकड़ी दिखाती तो झपरू हों हों करता , उधर से दौड़ काट देता था , इस तरह मधुली ठुल ईजा ओर झपरू के बीच दिन भर द्वंद युद्ध चलता रहता था।  पर कमाल की बात ये थी की झपरू ,मधुली ठुल ईजा के पीछे पीछे ,जंगल जरूर जाता था ,ओर फिर मधुली ठुल ईजा के साथ ही वापस आता।  कभी उसके आगे आगे तो ,कभी उसके पीछे , पर तब हों हों नही करता था बिल्कुल भी।  इस बात पर हँसी भी आती थी , ओर हम कहते भी थे की , ठुल ईजा ( ताई ) यो ( ये ) झपरू याँ ( यहाँ ) तो त्वैक देख बेर ...