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दलीप का स्टोन आर्ट

गाड ( नदी ) किनारे हमारे छान से ही कुछ दूरी पर दलीप की कुड़ी ( मकान ) थी , जहाँ हम लोग सर्दियों में ही गाड ( नदी ) किनारे वाले छानों में ही रहने आते थे, वहीं दलीप बारहों मास गाड ( नदी ) किनारे वाली कुड़ी ( मकान ) में अपने परिवार के साथ रहता था।

उनका पानी का घट ( पन्नचक्की ) था ,ओर वही उनकी आजीविका का मुख्य साधन था।
गाड का अगर मेरा कोई उस वक़्त कोई सबसे प्रिय साथी हुआ करता था तो वो था दलीप।

हम दिन भर नदी में खेला कूदा करते, मछली पकड़ा करते ओर विभिन आकारों के पत्थर इकट्ठा किया करते थे,ओर उन्हें अलग अलग ढंग से सजाया करते थे, दलीप इस काम में उस्ताद ठहरा।

मेरी गर्मियों की छुट्टी खत्म होते ही, मुझे फिर शहर लौटना पड़ता ओर हम फिर एक साल के लिये बिछुड़ जाते।

वक़्त बीतने के साथ ही दलीप ओर मेरे बीच की दूरियाँ बढ़ती चली गई।
पढ़ लिख कर जहाँ मैं शहर में ही रह गया था तो, दलीप वहीं गाड ( नदी ) किनारे से बाहर नही निकला, सुना था के वहीं रहकर अब घट ( पन्नचक्की ) चलाता है।

व्यस्तता के कारण धीरे धीरे गाँव आना भी जहाँ कम हों गया था, वहीं गाड ( नदी ) जाना तो बिल्कुल छूट ही गया ठहरा!

पर बड़ा मन करता था की वहाँ जाकर दलीप के साथ पुरानी यादें ताजा की जाऐं, पर मौका नही मिल पा रहा था।

पिछले साल पहाड़ों में कुछ रोजगार की तलाश में आने का मौका लगा ओर काफी दिन रुकना भी हुआ, इसी के चलते गाँव का भी दौरा लगा, वहाँ बाजार में मुझे दलीप मिल गया।
उससे हाल समाचार ओर काम धंधे के बारे पर पूछने के दौरान पता लगा की, जो हम नदी से  विभिन्न आकृतियों के पत्थर इकट्ठा करते थे, उसका काम भी कर रहा है।

ये सुनकर मेरी गाड ( नदी ) जाने की जिज्ञासा ओर प्रबल हो उठी।

मैं दलीप को बोला की मुझे देखना है वो काम, इसलिए तू बाजार का काम करके घर आ जाना, यही दिन का भोजन करके फिर गाड ( नदी ) को निकल लेंगे।

दलीप बाजार का काम निपटा कर दिन को घर आ गया, हम लोगों ने साथ भोजन किया ओर फिर निकल पड़े गाड ( नदी ) की ओर।

आधे घन्टे का सफर करने के बाद आखिरकार पहुँच गए गाड ( नदी ) वाले घर में।
वहाँ जाकर दलीप का पत्थरों वाला काम देखा तो दंग रह गया, दलीप ने जिस तरह से नदी के पत्थरों का उपयोग कर आकृतियाँ बनाई थी, वो नायाब थी।
मैं सोच भी नही सकता था की, पत्थरों का ऐसा भी उपयोग हो सकता है,पर दलीप ने ये किया था,विभिन डिजाइन प्रदान कर दी थी उन पत्थरों को।
पूछने पर पता लगा की इन आकृतियों को वो हल्द्वानी में किसी को बेचता है ओर अच्छा खासा कमा रहा है, वो भी गाड ( नदी )  किनारे रह कर।
ओर हम जैसे लोग धक्के खा रहें हैं शहरों में बेबात ही॥
जबकि इन पहाड़ों में इतना सामर्थ्य है की, वो हमें हर तरह का रोजगार प्रदान कर सकता है, बस जरूरत है उन अवसरों को तलाशने की।

स्वरचित लघु कथा 
सर्वाधिकार सुरक्षित

English Varsion 

Daleep stone arts
 At some distance from our sidelines on the (river) shore, there was a dud (house) of Daleep, where we used to come to stay in the winter (Dhan) banks only, while Daleep came up with the twelve month (river) banks.  He lived with his family in the (house), his was water pannchakki, and that was his main means of livelihood.

 If any of my friends used to be my favorite companion at that time, it was Daleep.

 We used to play in the river throughout the day, catch fish and collect stones of different sizes, and decorate them differently, Daleep was a master in this work.

 At the end of my summer vacation, I had to return to the city again and we would be separated again for a year.

 With the passage of time, the distance between me and Daleep kept growing.
After reading and writing where I stayed in the city, Daleep did not get out from the side of the river, I heard that staying there now Ghat (Panchakki)  Runs.

 Due to the busyness, while coming to the village gradually decreased, going to Gad (river) was totally missed, but I felt very fond of going there to relive old memories with Daleep, but could not get a chance.

 Last year, there was an opportunity to come in search of some employment in the mountains and had to stay for a long time, due to which I also visited the village, I got Daleep in the village market there.
 While inquiring from him about the recent news and work business, we found out that we used to collect stones of various shapes from the river, which is also doing its work.

On hearing my curiosity of going to my gad (river) became stronger.

 I told Daleep that I have to see that work, so you come home after doing the work of the market, after eating togather , then we will come out to the gad (river).

 After completing the work of market Daleep came home, we had food and then went towards Gad (river), after half an hour journey, finally reached Gad (river) house.

 After going there, I was stunned to see the work done by Daleep, the way Daleep made the shapes using the stones of the river.
It was unique, I could not imagine that the stones could be used like this, but  Dalip had done this, had given various designs to those stones.
 On asking, it was found out that he sells these shapes to someone in Haldwani and is earning a lot, that too by staying on the side of the gad (river), and people like us are raiding in the cities.
These mountains provide lot of work  so if the ability.

 is that mountaion can provide us all kinds of jobs, just need to explore those opportunities.

 Scripted short story
 All rights reserved

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुन्दर संदेश देती है। आपकी कहानियां 👌👌🙏🙏

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    1. छोटी सी कोशिश वहाँ के लोगों को जागृत करने की,पढ़ने हेतु आभार आपका

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