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दीनू गुरू

दीनू गुरु के हाथ के  पकाये दाल भात ओर टपकी की बात कुछ ओर ही ठहरी , स्वाद ऐसा की पेट भर जाये फिर भी थोडा ओर सपोडने का मन कर ही जाता था।  

दीनू गुरु भी बनाते बडे मन लगा करके , चावल को साफ धो धा कर ताँबे के तौले में डालने से लेकर , उसमें पानी डालने तक का , एक एक कार्य बडे मन से करते। 

ऐसे ही दाल को भडडू में पकाने के दौरान होता , काम बडे मनोवेग से किया जाता , चूल्हे में लकड़ियाँ कम ज्यादा करते रहते , जो शायद स्वाद के कारणों में से एक क्रिया थी , बीच बीच में कारिबारियों ( काम में सहयोग करने वाले लोग ) से चाय पीते हुये , मजाक ठटठा भी चलता रहता। 

पहाड़ में दाल भात की रसोई बडी पवित्र मानी जाती है , जो पंडित ही बनाते हैं ओर उन्हीं पंडितों में से एक थे दीनू गुरु। 

मैं जब भी जाता तो उन्हें दाल भात गुरु कहता , वो खूब हँसते ओर बोलते बिष्ट ज्यूँ आपने नाम जोर का रख मारा है बल मेरा , वो  मेरे हमउम्र से थे , थोडा बहुत बडे होंगें ज्यादा से ज्यादा इसलिये थोडा मजाक चल जाने वाली हुई। 

पर सच कहूँ तो दाल भात की रसोई बनाने में उनका कोई सानी नही था , दाल तो ऐसी के उँगलियाँ चाटते रह जाते थे लोग , गजब का स्वाद  , क्या मजाल मसाले इधर उधर हो जाये , सब बराबर स्वादानुसार। 
तड़का तो गजब ही ढा देता था , बडे सारे दाडु ( छौंक लगाने का कर्चा ) में गरम घी में जीरे ओर खड़े मसालों का तड़का जब भड़डू में डाला जाता तो भुड भुड की आवाज ओर उससे उठने वाली खुशबू भूख जगा मारती थी , मन होता था की पास जाकर बनता हुआ देखूँ पर वहाँ दीनू गुरु के अलावा किसी का भी जाना वर्जित होता था। 

दीनू गुरु के दाल भात में मसालों के अतिरिक्त प्रेम ओर सौम्यता की खुशबू का योगदान कम नही ठहरा , दो ढाई हजार लोगों के लिये दाल भात ओर टपकी बनाना वो भी गजब के स्वाद के साथ इनके बिना संभव भी नही लगता था मुझे तो। 

खुले आसमान के नीचे धधकते बडे बडे चूल्हो में इतना सब बनाना ,वो भी चेहरे में मुस्कान लिये ,बडी तपस्या सी ही ठहरी , इस तपस्या का फल ही शायद स्वाद के रूप में दीनू गुरु के बनाये खाने में उतर आता था। 

आसपास के इलाके में दीनू गुरु अपने स्वाद के लिये प्रसिद्ध थे ओर मेरे लिये तो वो किसी बडे शेफ से कम ना थे हमारे दीनू गुरु! 

स्वरचित लघु कथा 
सर्वाधिकार सुरक्षित

English version

Dinu Guru's hand cooked lentils and the matter of drip remained somewhat different, the taste is so full that even then I used to feel like a little more support.


 Dinu Guru also used to make a big heart, from washing rice cleanly and putting it in a copper towel, to pouring water into it, doing everything with a big heart.


 The same kind of pulses would be done during cooking in Bhadoo, the work was done with a lot of enthusiasm, the wood in the stove used to be reduced more, which was probably one of the reasons for taste, from the intervening caribaris (people who support the work)  While drinking tea, the joke also goes on.



 The kitchen of Dal Bhat in the mountain is considered very sacred, which is made by the Pandits only and one of those Pandits was Dinu Guru.



 Whenever I used to go, I would call him Daal Bhat Guru, he used to laugh and speak very loudly, you have hit my name with a loud force, mine, he was from my age, it will be a lot bigger and more and more so it is going to be a little fun.



 But frankly, they did not have any strength in the cooking of Dal Bhat, people used to keep licking fingers of pulses, such a wonderful taste, whether the spices should be spilled here and there, all according to taste.


 Tadka used to be a great force, when a spice of spices standing on the cumin in hot ghee was added to a large whole Dadu (form of punching), the sound of the earth and the aroma emanating from it would arouse the appetite, the mind would  Had to go and see the formation, but it was forbidden to go to anyone except Dinu Guru there.



 The addition of spices to the Dinu Guru's dal bhaat did not diminish the contribution of love and the fragrance of mildness, making dal bhat and drip for two and a half thousand people, it was not possible without the taste of amazing things.



 Making so much in the blazing big chulho under the open sky, he too smiled in the face, the great austerity remained, the fruits of this austerity probably came down to the food cooked by Dinu Guru as a taste.



 Dinu Guru was famous for his taste in the surrounding area and for me he was no less than a big chef, such was our Dinu Guru!


 Scripted short story

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टिप्पणियाँ

  1. Bisht ji , very nice
    Aapki laghu kathio mai apne pahar ka bholapan aur aapsi pyar ,bhai chare ka put , sach mai man ko chhoti hai.

    Thanks 🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर 👌👌 आपकी पहाड़ी कथाएं देव भूमि की पहाड़ी पहचान और खान पान व संस्कृतियों से रूबरू कराती है। धन्यवाद अर्जुन दा🙏🙏

    जवाब देंहटाएं

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