सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हुनरमंद

हुनरमंद

मेरे एक मित्र ने एक पोस्ट भेजी की, पहाड़ गये हो तो इस जगह जा  आना, वहाँ एक बुजुर्ग रिंगाल ( एक तरह की बाँस की प्रजाति ) से खूबसूरत सामान बनाते हैं, उन पर एक कहानी लिखोगे तो खूबसूरत लगेगी।
बस फिर क्या था मैं निकल पड़ा अपनी तैयारी करके, जगह नई थी, ओर अनजानी भी, पर हमारे पहाड़ के लोग इतने मिलनसार होते हैं की, इस बात की फिक्र नही थी की, वहाँ कोई परेशानी आयेगी, ओर मैं तो मूलतः वहीं का हुआ तो, भाषा की भी समस्या भी नही थी।
मोटरसाइकिल से सफर प्रारम्भ हुआ, रास्तों के सुँदर नजारों का आनंद लेता हुआ, बढता गया गंतव्य की ओर , एक जगह रोड किनारे बने रेस्टोरेंट में नाश्ता कर थोड़ी पेटपूजा की ओर फिर आगे का रास्ता पूछ कर निकल पड़ा सफर की ओर।
पहाड़ के नजारे देखते हुये कब गंतव्य के समीप पहुँच गया पता ही नही चला।
यहाँ से एक सड़क ऊपर की ओर जा रही थी, ओर जहाँ मुझे जाना था वो इस जगह से 4 किलोमीटर पर था, सड़क कच्ची थी, शायद हाल ही में बनी थी, आजकल प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत पहाड़ों में सड़कों का जाल सा बिछ गया है, इससे लोगों कों काफी सहूलियत हो गई है।
रास्ते में बढ़ते हुये आखिरकार पहुँच गया उस जगह जहाँ मुझे आना था, बड़ा खूबसूरत गाँव था, खूबसूरत नजारे मंत्रमुग्ध कर रहे थे।
ऊँचे ऊँचे पहाड़, फलों के वृक्ष, चरते हुये जानवर, घर के आँगन में काम करते हुये लोग बेहद खूबसूरत लग रहे थे।
इन नजारों का लुफ्त लेता हुआ, आखिरकार पहुँच गया उन बुजुर्ग के वहाँ, जिनसे मिलने के लिये मैनें ये सफर तय किया था।

बुजुर्ग आँगन में बैठे रिंगाल से कलाकृति बनाने में मशगूल थे ,उनसे रामा श्यामा की ओर लग गया, ये जानने में की कैसे बनता है ये इतना सुँदर सामान।
बुजुर्ग भी सवालों के जवाब देते हुये बताने लगे की 40 साल हो गये उन्हें ये बनाते हुये, पहले सुपे ( जिसमें अनाज को फटकार कर साफ किया जाता है ) कोरंग ( जिसमें सूखे अनाज का भंडारण किया जाता है ) इत्यादि बनते थे, आजकल उनका प्रचलन कम हो गया ठहरा तो ये सजावटी सामान बनाते हैं।
बातचीत के दौरान ही आमा ( बुजुर्ग की पत्नी ) चाय बना लाई, ये पहाड़ की खासियतों में से एक है की, यहाँ आपसे पूछे बिना, आपके लिये एक चाय का गिलास जरूर बन कर आ जायेगा।
चाय पीते हुये मैं लगातार उनसे सवाल करता रह रहा था ओर वो अपने काम के बारे में जानकारी दे रहे थे।

पहले ओर अब में कितना फर्क आया इस काम में पूछने पर बुजुर्ग बोले पैली जमान भल छी ( पहले का टाइम अच्छा था ) सूप, कोरंग, टोकरी भल बिक जाँ छी ( सूप, कोरंग, टोकरी अच्छी बिक जाती थी ) खर्च पात ठीक चल जाँ छी ( खर्चा पानी ठीक चल जाता था ), अब उनुके क्वै न लिन ( अब उन्हें कोई नही लेता ) तैभे आजकल यो सामान बनौण पड़ूँ ( तभी आजकल ये सजावटी सामान बनाना पड़ता है ) ये में खाली लेबरी मिल जाँ ( इसमें खाली लेबर मिलती है, असली कमाई तो बिचौल्ली खा जाँ ( असली कमाई तो बिचौलिया खा जाता है ) ओर आजकल रिंगाल लै आसानी ले ना मिलूँण ( ओर रिंगाल भी आसानी से नही मिलता)।
वास्तव में सही कह रहे थे बुजुर्ग, बिचौलिए असली कमाई कर रहे थे ओर कला जानने वाले लेबर बने बैठे थे, ऊपर से वनों में से रिंगाल काटने पर प्रतिबंध ने इस काम की रीढ़ ही तोड़ डाली थी।

सरकार अगर इस ओर ध्यान दे तो उत्तराखण्ड का ये रिंगाल, अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है।

स्वरचित कथा 
सर्वाधिकार सुरक्षित

English Version 

Arizen

A friend of mine sent a post, If you have gone to the mountains, then come to this place, make beautiful items from an elderly ringle (a kind of bamboo species), if you write a story on them, it will look beautiful.
 What was it then? I started preparing myself, the place was new, and also unknown, but the people of our mountain are so friendly, did not worry that there would be any problem, and I was basically there.  So, there was no language problem either.

 The journey started by motorbike, enjoying the beautiful views of the paths, moving towards the destination, having breakfast in a road-side restaurant, a little petulance and then proceeding towards the journey.

 Did not know when reached near the destination in view of the view of the mountain.

 A road was going upwards from here, and where I had to go it was 4 kilometers from this place, the road was rough, maybe recently built, nowadays, under the Prime Minister's Road Scheme, the roads in the mountains were spread like a network  Yes, this has made people very comfortable.

 Growing on the way, I finally reached the place where I had to come, there was a beautiful village, beautiful eyes were mesmerizing.

 High mountains, fruit trees, grazing animals, people looked very beautiful while working in the courtyard of the house.

 Taking care of these views, finally reached the elders, whom I had traveled this way to meet.

 The elders were busy making artwork from Ringal sitting in the courtyard, they turned towards Rama Shyama, to know how this beautiful stuff is made.

 The elders also started answering the questions, saying that it has been 40 years since they were made, first supe (in which grains are cleaned by ripping), korang (in which dried grains are stored) etc. were made, nowadays their practice  If reduced, they make decorative items.

 During the conversation, Ama (wife of the elder) made tea, this is one of the specialties of the mountain, that without asking you here, a glass of tea will definitely come for you.

 I was constantly questioning him while drinking tea and he was giving information about his work.

 When asked how much difference was there in the first and now, in this work, the elderly said, "Pally Zaman Bhal Chhi (earlier time was good) Soup, Korang, Baskets Bhal Jahni Chhi (Soup, Korang, Baskets were sold well)"  Chee (the water used to go well), now their quain lin (no one takes them now), nowadays, I have to make these items (then nowadays we have to make ornamental items).  , The real earning is to eat the middleman (real money is eaten by the middleman) and nowadays the ringle is not easy to find (and the ringle is not easy either).

 In fact, the elders were right, the middlemen were earning real money and the art-educated were sitting as laborers, the ban on cutting the ring from the top of the forest broke the backbone of this work.

 If the government pays attention to this, then this ringle of Uttarakhand can make its mark at the international level.

 Narrative story
 All rights reserved

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अपनापन - Affinity short Story in hindi

ज्योति पढ़ लिख कर इंजीनियर बन गई थी , ओर फिर नौकरी के लिये सिंगापुर चली गई , काफी सालों से पहाड़ नही आई , यदा कदा फोन पर जरूर बात हो जाती थी।  short Story in hindi एक दिन ज्योति का फोन आया सिंगापुर से , की दद्दा जयपुर हो या पहाड़ , मैंनें उससे कहा की गर्मियों में तो तुम्हारा दद्दा पहाड़ों पर ही मिलेगा।  ये सुनकर ज्योति बोली दद्दा बहुत सालों से पहाड़ नही गई , बहुत मन कर रहा है वहाँ जाने का।  ओर उसका मन करता भी क्यों नही , क्योंकि पहाड़ी कहीं भी रह ले , उसके दिल के एक कोने में पहाड़ के प्रति प्रेम जरूर रहता है , ओर जिस दिन ये प्रेम उमड़ पडता है , वो भाग कर पहाड़ों में चला आता है।  शायद ज्योति का भी पहाड़ प्रेम उमड़ आया था , इसलिये वो पहाड़ जाने के लिये बोल रही थी। short Story in hindi मैंनें कहा आजा थोडा पहाड़ घूम कर तसल्ली हो जायेगी , वो बोली दद्दा इस बार अपने गाँव जाना चाहती हूँ , हिल स्टेशनों कि बजाय , इसलिये आपको चलना होगा मेरे साथ , मैं तो अब रास्ता भी भूल सी गई वहाँ का।  मैंनें कहा तू आजा फिर चलते हैं तेरे गाँव इस बार , तेरी कुड़ी ( मकान ) का तो पता नही...

बसंती दी

। बसन्ती दी जब 15 साल की थी ,तब उनका ब्या कर दिया गया ,ससुराल गई ओर 8 साल बाद एक दिन उनके ससुर उन्हें उनके मायके में छोड़ गये ,ओर फिर कोई उन्हें लेने नही आया ,बसन्ती दी के बौज्यू कई बार उनके ससुराल गये ,पर हर बार उनके ससुराल वालों ने उन्हें वापस लेने से ये कहकर  इंकार कर दिया की ,बसन्ती बाँझ है ओर  ये हमें वारिस नही दे सकती तब से बसन्ती दी अपने पीहर ही रही।  बाँझ होने का दँश झेलते हुये बसन्ती दी की उम्र अब 55 के लगभग हो चुकी थी ,उनके बौज्यू ने समझदारी दिखाते हुये 10 नाली जमीन ओर एक कुड़ी उनके नाम कर दी थी ,ताकि बाद में उनको किसी भी प्रकार से परेशानी ना हो ,ओर वो अपने बल पर अपनी जिंदगी जी सके। बसन्ती दी ने उस जमीन के कुछ हिस्से में फलों के पेड़ लगा दिये ओर बाकि की जमीन में सब्जियाँ इत्यादि लगाना शुरू किया ,अकेली प्राणी ठहरी तो गुजारा आराम से चलने लगा ,भाई बहिनों की शादियाँ हो गई ,भाई लोग बाहर नौकरी करने लगे ,वक़्त बीतता चला गया। बसन्ती दी शुरू से ही मिलनसार रही थी ,इसके चलते गाँव के लोग उनका सम्मान करते थे ,ओर खुद बसन्ती दी ...

देवता का न्याय

थोकदार परिवारों के ना घर में ही नही ,अपितु पूरे गाँव में दहशत छाई हुई थी ,कुछ दिनों से थोकदार खानदान के सारे घरों में ,घर के सदस्यों को पागलपन के जैसे लक्षण देखने को मिल रहे थे ,यहाँ तक की गाय भैंसों ने भी दूध देना बंद कर दिया था ,किसी को समझ नही आ रहा था की आखिर ये हो क्या रहा है। पहाड़ में अगर ऐसा होना लगे तो ,लोग देवी देवताओं का प्रकोप मानने लगते हैं ,ओर उनका अंतिम सहारा होता है लोक देवताओं का आवाहन ,इसलिये थोकदार परिवारों ने भी जागर की शरण ली। खूब जागा लगाई काफी जतन किये ,पर कौन था किसके कारण ये सब हो रहा था ,पता नही लग पा रहा था ,जिसके भी आँग ( शरीर ) में अवतरित हो रहा था ,वो सिर्फ गुस्से में उबलता दिखाई दे रहा था ,पर बोल कुछ नही रहा था ,लाख जतन कर लिये थे ,पर समस्या ज्यों की त्यों थी ,गाँव वाले समझ नही पा रहे थे की आखिर थोकदार परिवार को इस तरह परेशान कौन कर रहा है ,ओर तो ओर जगरिये उससे कुछ बुलवा नही पा रहे हैं ,अंत में गाँव में आया हुआ एक मेहमान बोला मेरे गाँव में एक नौताड़ ( नया ) अवतरित हुआ है ,उसे बुला कर देखो क्या पता वो कुछ कर सके ,थोकदार परिवार ने दूसर...