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जाड़ों का पहाड़ - Mountain in Winter

जाड़ों का मौसम उत्तराखण्ड को खूबसूरत बना देने वाला मौसम होता है, शायद इसलिए ही सैलानी वहाँ जाते हैं।

हम उत्तराखण्डी प्रवासी तो अक्सर जाड़ों में वहाँ जाने से कतराते रहते हैं,हम लोग तो जाने वाले ठहरे बल गर्मियों में, तब बच्चों की छुट्टियाँ भी पड़ने वाली हुई ओर मैदानी इलाकों में लू का भी प्रकोप हुआ।

पर इस बार तय किया की पहाड़ के जाड़ों का भी थोडा़ अनुभव किया जाये,एक दो न्यौते भी आये थे, उनमें भी जाना हों जायेगा ओर जाड़ों के मौसम का पहाड़ को भी देखना हों जायेगा।

बस यही सोच कर ट्रेन का टिकट कटवा लिया ओर निकल पड़े यात्रा में, रात को ट्रेन में भी ठंड हुई, अच्छा हुआ की एक कंबल ले आया था।
अलसुबह ही ट्रेन काठगोदाम स्टेशन पर पहुँच गई, चारों ओर कोहरा छाया हुआ था, बैग उठाये स्टेशन से बाहर आया, गजब की ठंड पड़ रही थी, स्टेशन के बाहर आकर चाय की दुकान में चाय पी, तब जाकर थोडा़ चैन आया।

अब इंतजार था की कोई गाडी मिल जायें भीमताल तक की तो उसमें निकल लें,तभी एक जीप आ गई जो भीमताल होते हुये आगे जा रही थी, मैं उसमें बैठ कर निकल लिया।
लगभग एक घन्टे का सफर करके गाडी पहुँच गई ठहरी भीमताल, ओर मल्लीताल में जहाँ झील शुरू होती है वहाँ उतर लिया।

वहाँ से 500 मीटर ऊपर जून स्टेट को पैदल चल दिया ,थोड़ी देर के पैदल सफर के बाद पहुँच गया ससुराल।

वहाँ एक आद दिन रुकने के बाद मेरा अगला पड़ाव था, मोरनौला जहाँ बर्फ पड़ती है ओर ये मेरा पहला मौका होगा, जब साक्षात बर्फ गिरता देखने को मिलेगी।
ओर निकल पड़ा अपने अगले पड़ाव की ओर लगभग दो ढाई घन्टे का सफर करने के दौरान रास्ते भर पहाड़ों की खूबसूरती का आनंद लेने के बाद आखिरकार पहँच गया मोरनौला।
वहाँ उतर कर एक दुकान में मिश्री वाली चाय का आनंद लेते हुये थोडा़ अपने शरीर को गर्म किया, नाक मुँह से धुआँ सा निकल रहा था, चारों ओर बर्फ की चादर बिछी हुई थी।

इतने में भिन ज्यू ( जीजाजी ) आ गये लेने ओर हम निकल लिये उनकी गाँव की ओर, जो बाजार से थोडा़ सा ही दूर था।
गाँव पूरी तरह से बर्फ से ढका हुआ था, सेब के बगीचे भी बर्फ से ढके हुये थे,ठंड के कारण कान नाक में भी दर्द हो रहा था, पर बर्फ देखने के आनंद में उन पर ध्यान कम ही था।

घर पहुँच कर गरम पानी से हाथ पैर धोये ओर एक गिलास भर चाय का फिर हड़का ( पी ) गया, यहाँ एक दिन में जितनी चाय पी ली थी, उतनी चाय शहरों में एक हफ्ते में पीते हैं, चाय का खर्चा बहुत हुआ पहाड़ों में।

चाय पीने के कुछ देर बाद ही दीदी ने खाने के लिये आवाज दे दी ओर मैं ओर भिन ज्यू चल दिये चुल्यान ( रसोई ) की ओर ,वहाँ का तापमान गुनगुना था, जो सही लग रहा था मुझे।
दीदी ने दाल भात टपकी बनाया हुआ था, जो स्वादिष्ट, ठंड ओर भूख के कारण काफी मात्रा में सपोड ( खा ) गया ठहरा।

इस तरह खत्म हुआ मेरा पहाड़ों में जाड़ों के सफर का दूसरा पड़ाव।
स्वरचित यात्रा संस्मरण 
सर्वाधिकार सुरक्षित

English Version 

Mountain in Winter 
 The winter season is the season which makes Uttarakhand beautiful, perhaps that is why tourists go there.

 We Uttarakhandi migrants are often deterred from going there in the winter, we are going to stay in the summer, then there was an outbreak of warm air in the plains and also due to children's holidays.

 But this time it has been decided that the winter of the mountain should be experienced a little, one or two invitations were also received, they will also have to be known and the mountain of winter season will also have to be seen.

 Thinking just that, the train ticket was cut and in the journey started, the train got cold at night also, it was good to bring a blanket

 Early morning reached the Kathgodam station, there was fog all around, picked up the bags, came out of the station, it was very cold, came out of the station to drink tea in the tea shop, then went a little relaxed.

 Now I was waiting for some taxi to reach Bhimtal, then get out in it, then a jeep arrived which was going ahead through Bhimtal, I sat in it and got out.

 After traveling for almost an hour, she reached the train and landed at Bhimtal, where the lake starts in Mallital.

 500 meters up from there, walking on June State, reached the in-laws after a short walk.

 After stopping there one day, my next stop was, Mornaula where snow falls and this will be my first time, when the snow will fall.

 Mornaula finally arrived after enjoying the beauty of the mountains all the way while traveling for about two and a half hours towards his next stop.

 Descending there, enjoying the tea with sugar candy in a shop,  warmed body, smoke was coming out of his nose, there was a sheet of snow around.

 In the meantime, the brother-in-law came and took us to his village, which was a little away from the market.

 The village was completely covered with snow, the apple orchards were also covered with snow, the ears were also hurting due to cold, but they were less focused on the pleasure of seeing snow.

 After reaching home, washed his hands and feet with hot water and then drank a glass of tea, here drinks as much tea as did in a day, in the cities, drinks tea in a week, tea expenses are high in the mountains.

 Shortly after drinking the tea, sister gave voice to eat, and I walked towards towards kitchen, the temperature there was lukewarm, which seemed right to me.

 Didi ( sister ) made dal-bhat drip, which was tasty, cold and hungry due to a large number of eat.

 In this way my second phase of winter journey in the mountains ended.
 
Memorable Travel Memoirs
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